• बंधुआ मानवाधिकार और विकास / Bandhua Manavadhikar Aur Vikas

    बंधुआ मानवाधिकार और विकास / Bandhua Manavadhikar Aur Vikas

    0

    About the Book

    अधिकांश भारतीय राज्य और केंद्र शासित प्रदेश बंधुआ मजदूरी के अस्तित्व को अस्वीकार करने की स्थिति में हैं। कानून लागू करने वाली एजेंसियां अधिकांशतः बंधुआ श्रम (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 के निर्माताओं के सराहनीय इरादों पर खरी नहीं उतरी हैं। सरकारें सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सिफारिशों को धरातल पर उतारने में विफल रहीं। यह पुस्तक उन लोगों की मानसिकता को बदलने का प्रयास करती है जिन्हें आधुनिक समय की इस दासता (बंधुआ प्रथा) को खत्म करने का काम सौंपा गया है। यह सभी हितधारकों, विशेष रूप से गैर-लाभकारी संगठनों (NGOs) के मन में संविधान के प्रावधानों के बारे में एक व्यापक जागरूकता और आलोचनात्मक चेतना को बढ़ावा देने का प्रयास करती है। इस कार्य को एक द्वंदात्मक अभ्यास या प्रश्न-उत्तर (Q&A) प्रारूप के माध्यम से किया गया है। यह अपेक्षित है कि इससे प्रत्येक पाठक सोचने, मनन करने, आलोचनात्मक विश्लेषण करने, और उसी के अनुसार कदम उठाने में सक्षम होगा।
    ₹595.00
    Add to cart
  • भारत की शैक्षिक धरोहर

    भारत की शैक्षिक धरोहर

    0

    About the Book

    यूरोपीय विश्वविद्यालयों की स्थापना से बहुत पहले भारत में ज्ञानार्जन के बहु-विषयक केंद्र थे जिन्होंने विश्व भर में ज्ञान क्रांति को बढ़ावा दिया। यह पुस्तक भारत की महान शैक्षिक विरासत को कालक्रमानुसार दर्शाने की आवश्यकता को पूरा करती है। यह पुस्तक उस अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र का वर्णन करती है, जिसने यह सुनिश्चित किया कि गुरुओं और आचार्यों द्वारा पीढ़ियों तक छात्रों को ज्ञानार्जन का सौभाग्य मिलता रहे। जैसा लेखिका कहती हैं, “जब तलवारों ने रक्त से अपनी प्यास बुझाई और अकाल ने भूमि को तबाह कर दिया, तब भी भारतीय अपनी प्रज्ञा पर टिके रहे कि ज्ञान से अधिक पवित्र कुछ भी नहीं है।” लेखिका ने वाचिक इतिहास, स्थानीय विद्या, यात्रा वृतांत, उत्तरजीवी साहित्य, शिलालेख, संरक्षित पांडुलिपियों और विद्वानों व जनसाधारण के जीवन वृत्तान्त से जानकारी एकत्र की है। ऐतिहासिक रूप से, यह पुस्तक प्राचीन भारत की परंपराओं से लेकर इसकी विरासत के जानबूझकर विनाश करने तक के एक वृहत् काल को अंकित करती है। यह विद्यालय और विश्वविद्यालय शिक्षा की वर्तमान संरचना में प्राचीन शिक्षण प्रणालियों के सबसे प्रासंगिक पहलुओं को सम्मिलित करने के लिए आज उठाए जा सकने वाले कदमों की रूपरेखा से भी अवगत कराती है।

    ₹495.00
    Add to cart
  • भारतीय राज्य व्यवस्था / BHARATIYA RAJVYAVASTHA

    भारतीय राज्य व्यवस्था / BHARATIYA RAJVYAVASTHA

    0

    About the Book

    यह पुस्तक लेखक-द्वय के लगभग अठारह वर्षों के अध्ययन अनुभवों के साथ-साथ उनकी प्रशासनिक सक्रियता से प्राप्त अकादमिक व व्यवहारिक ज्ञान से उपजी है, जिसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें छात्रों की न केवल शिक्षण संबंधी कठिनाइयों को भली-भाँति समझा गया है, बल्कि उन्हें विषय संबंधी व्यवहारगत उचित मार्गदर्शन भी प्रदान किया गया है। यही कारण है कि विशेष रूप से सिविल सेवा और प्रांतीय लोक सेवा की तैयारी कर रहे अभ्यार्थियों के लिए लिखी गई यह पुस्तक अन्य स्नातक विद्यार्थियों के लिए भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। समसामयिक घटनाओं, जैसे कि-जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में धारा 370 के उपखंड-1 को छोड़कर अन्य उपखंडों का निरसन, विशेष राज्य के दर्जे को वित्त आयोग की अनुशंसा के द्वारा समाप्त किया जाना, नदी जल विवाद (कावेरी के विशेष संदर्भ में), उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पुनः पुरानी कॉलेजियम पद्यति की पुनर्बहाली, लोकपाल एवं लोकायुक्त जैसे पदों का सृजन इत्यादि विषयों को समाविष्ट करना इस पुस्तक की उपयोगिता को कई गुना बढ़ा देते हैं।

    ₹350.00
    Add to cart
  • लाचार नहीं हम/LACHAAR NAHIN HUM

    लाचार नहीं हम/LACHAAR NAHIN HUM

    0

    About the Book

    दिव्यांगता क्या है, इसकी परिभाषा क्या है, यह कितना गंभीर विषय है, दिव्यांग जनों की जनसंख्या कितनी है, इनके लिए देश और दुनिया में कानून क्या हैं, उनके अधिकार क्या हैं, यह पुस्तक दिव्यांगता से संबंधित इन सभी प्रश्नों के उत्तर और अन्य पहलुओं पर गहन चर्चा करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दुनिया में विकलांगों की जनसंख्या करीब 103 करोड़ है या विश्व की कुल आबादी का 15 प्रतिशत है। इतनी विशाल जनसंख्या होने के बावजूद हमारा ध्यान उनकी तरफ नहीं जाता है जबकि बहुत से दिव्यांग लोग शारीरिक कमजोरियों के बावजूद अनेक क्षेत्रों में सफलता के शिखर पर पहुंच रहे हैं जो यह साबित करता है कि वे मानसिक रूप से खुद को लाचार नहीं मानते हैं और कुछ भी करने में सक्षम हैं। कई संगठन भी उनके लिए सराहनीय प्रयास कर रहे हैं और उनके दबाव की वजह से सरकारें भी दिव्यांग जनों के लिए कानून बना रही हैं। फिर भी वे हमारे समाज की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन पाए हैं। हमें एक समावेशी समाज बनाने की जरूरत है। यह पुस्तक समावेशी समाज बनाने की दिशा में काम कर रहे अनेक संगठनों और निजी प्रयासों के बारे में जानकारी देती है। कुल मिलाकर दिव्यांगता के विषय पर यह एक व्यापक तस्वीर पेश करने वाली प्रामाणिक पुस्तक है।

    ₹495.00
    Add to cart
  • सफल सार्थक और सुखी जीवन का मार्ग : श्रीमद्भगवद्गीता

    सफल सार्थक और सुखी जीवन का मार्ग : श्रीमद्भगवद्गीता

    0

    About the Book

    भगवद् गीता एक ऐसा ग्रंथ है जो सदियों से अपने आध्यात्मिक ज्ञान से अज्ञान के अंधकार को दूर करके हमारे जीवन को प्रकाशित करता रहा है और हमारा मार्गदर्शन करता रहा है। यह हमें फल की कामना के बिना सदा कर्म करने के लिए प्रेरित करता है। वास्तव में गीता जीवन का एक संपूर्णदर्शन है जो हमारे जीवन को सार्थक और आध्यात्मिक रूप से सुखी बनाने का मार्ग दिखाता है। गीता पर समय-समय पर ढेरों टीकाएं लिखी जा चुकी हैं और उनमें गहन व्याख्याएं की गई हैं लेकिन अधिकतर टीकाएं इतनी गूढ़ हैं कि साधारण पाठकों के लिए अत्यंत दुरूह हो जाती हैं। शायद इसी बात को ध्यान में रखकर डॉ. सुभाष काश्यप जी ने गीता को यथावत् रूप में साधारण पाठकों के सामने प्रस्तुत करने का सराहनीय प्रयास किया है। वयोवृद्ध विद्वान डॉ. काश्यप करीब 80 वर्ष पहले अपने विद्यार्थी जीवन से ही गीता के उपदेशों के प्रति आकर्षित हो गए थे। उन्होंने तभी से गीता पर एक सरल टिप्पणी लिखने का संकल्प कर लिया था। वैसे तो वे दर्शन एवं राजनीति शास्त्र के अध्येता और विद्वान हैं और इन विषयों पर उनकी सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं लेकिन गीता पर सरल टिप्पणी लिखने का उनका संकल्प अब पूरा हुआ है। इस पुस्तक की विशेषता यह है कि गीता के श्लोकों का अर्थ सरल भाषा में यथावत् रूप में प्रस्तुत किया गया है। गीता को समझने की इच्छा रखने वाले साधारण पाठकों को निश्चित रूप से यह पुस्तक बहुत पसंदआएगी।

    ₹425.00
    Add to cart